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जब नाश मनुज पर छाता है...

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द इंडियन एक्सप्रेस से लिए गए इस आलेख में सुशांत सिंह बता रहे हैं कि कैसे रवांडा से मिले सबक़ को याद करें तो व्हाट्सऐप पर तेज़ी से फैल रहे नफ़रत भरे संदेशों को लेकर चिंतित होना लाज़िमी है. व्हाट्सऐप के ज़रिए हमें जो फ़र्ज़ी मैसेजेज़, ज़हर उगलते वीडियोज़ मिल रहे हैं, उन्हें अप्रासंगिक क़रार देकर सीधा ख़ारिज नहीं किया जा सकता. साल 1994, देश रवांडा. 12 हफ़्तों के दौरान यहां हुतु समुदाय के लोगों ने तुत्सी समुदाय के क़रीब आठ लाख लोगों की हत्या की थी. इसे आधुनिक युग का सबसे ख़तरनाक़ नरसंहार माना जाता है. हिंसा के इस दौर में वहां के एक प्राइवेट रेडियो-टेलिविज़न लिब्रे दस मिल कालिन्स (RTLMC) पर प्रचारित नारा था - सारे क़ब्रिस्तान अभी भरे नहीं हैं.  हालांकि इस नरसंहार की जड़ें रवांडा के औपनिवेशिक इतिहास में समाई हुई हैं, लेकिन नफ़रत की इस आग को हवा देने का काम मीडिया ने किया था, ख़ास तौर पर रेडियो ने. रवांडा के नरसंहार को भड़काने और फैलाने में मीडिया एक ताक़तवर हथियार साबित हुई. 23 साल बीत चुके हैं, और भारत अभी रवांडा बनने से कोसों दूर है, लेकिन उस दौरान मिले सबक़ आज की परिस्थिति में बहुत बड़ी अहमियत रख...

ये जवाहरलाल नेहरू थे जिन्होंने भारतीय सेना को पाकिस्तान-सा नहीं बनने दिया

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भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की विरासत पर अक्सर दो चीज़ों को लेकर तोहमत लगाई जाती है. एक है कश्मीर मुद्दा और दूसरा चीन से भारत को मिली करारी शिकस्त. हाल के सालों में भी बार-बार नेहरू की इन दो कथित नाकामियों पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर देकर ये बात स्थापित करने की कोशिश की गई है कि नेहरू ने सेना को वो अहमियत नहीं दी जो दी जानी चाहिए. इंडियन एक्सप्रेस के एक आलेख में एक पूर्व सेनाधिकारी सुशांत सिंह ने सीधे तौर पर इसे सच से कोसों दूर तो बताया ही है, साथ ही उन्होंने कहा है कि इतिहास में नेहरू को ज़्यादा ही उदार बताने के चक्कर में उनकी जो कट्टर युद्धविरोधी छवि पेश की गई है, उससे भी नेहरू को लेकर एक गुमराह करने वाला नज़रिया पैदा हुआ है. सेना के नाम पर राष्ट्रवाद और देशभक्ति की कथित राजनीति करने वालों को ये नहीं भूलना चाहिए कि ये नेहरू ही थे जिन्होंने सेना पर सिविल अथॉरिटी की मज़बूत पकड़ और नियंत्रण की बुनियाद रखी. वरना आज भारत भी उन देशों की सूची में शुमार होता जहां सिविल प्रशासन बस दिखावा है और सेना के पास असली ताक़त है. नज़ीर के तौर पर हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान. ये नेहरू ही थे जिन्होंने ...